मेरी ग़ज़लों में प्रयुक्त प्रतिबिंब और रूपक भी अपरंपरागत हैं। उदाहरण के लिए, अंधेरे को परंपरागत रूप से नकारात्मक प्रतीक माना गया है, किन्तु मेरे शेरों में अंधेरे के स्वतंत्र अस्तित्व की ओर भी संकेत किया गया है: ‘‘दिखाई दे न दे ऐसी भी कोई रौशनी होगी अँधेरों की कोई अपनी जुदा पहचान भी होगी’’
जन्म से दृष्टिबाधित होने के कारण मैं श्रवण और स्पर्श के अनुभवों के प्रति अधिक सजग रहा हूँ। यही कारण है कि मेरी ग़ज़लों में श्रवण और स्पर्श के सौंदर्यबोध को जागृत करने वाले कई शेर मौजूद हैं। मेरा सृजन किसी कृत्रिम बंधन में बंधने को तैयार नहीं है। यदि मेरी ग़ज़लें किसी मूल्य का सांगोपांग करती हैं तो वह है मानवता का मूल्य। प्रेम की भावना ग़ज़ल के केंद्र में रही है। मेरी ग़ज़लों में भी प्रेम की अनुभूतियों की झलक यत्र-तत्र मिलती है। प्रेम को नए प्रतीकों, नए रूपकों तथा नई उपमाओं के ज़रिए प्रस्तुत करने का प्रयास मैंने किया है।
Author - Dr. Vinod asudani
